मानव का धर्म क्या है?
मानव धर्म का प्रश्न उतना ही गहरा है जितना जीवन स्वयं। सदियों से संतों, ऋषियों और महापुरुषों ने यह समझाने का प्रयास किया है कि मनुष्य का सच्चा धर्म किसी विशेष पूजा-पाठ या परंपरा में सीमित नहीं है। बल्कि मानव का परम धर्म मानवता में ही निहित है।
मानव धर्म का मूल स्वरूप.
जब मनुष्य अपने जीवन में दया, करुणा, सत्य और संयम को स्थान देता है, तभी उसका अस्तित्व ईश्वर की ओर उन्मुख होता है। धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि हमारे आचरण, विचार और व्यवहार में प्रकट होता है।
- दूसरों के सुख-दुख में साथ खड़ा होना
- सहानुभूति और सेवा का भाव रखना
- ईमानदारी और सत्य को जीवन में उतारना
- संयम और संतुलन से जीवन जीना
- यही वह आधार हैं जिन पर मानव धर्म की नींव खड़ी है।
क्यों आवश्यक है मानवता?
बिना मानवता के धर्म केवल एक ढांचा है, जिसका कोई जीवंत अस्तित्व नहीं। यदि मनुष्य करुणा और प्रेम से विहीन हो जाता है तो उसका जीवन अधूरा और निरर्थक बन जाता है। इसलिए कहा गया है कि मानवता ही सच्चा धर्म है।
निष्कर्ष
मनुष्य यदि मानवता को अपनाता है, तो वह वास्तव में धर्म को जीवित रखता है। धर्म का मापदंड मंदिर, मस्जिद या पूजा नहीं, बल्कि यह है कि हम कितनी ईमानदारी और प्रेम से एक-दूसरे के काम आते हैं। यही मानव धर्म का सार है, और यही जीवन की सबसे बड़ी साधना।
✍️ विचार लेखक :
सौ. लताताई दिलीपराव बुरडे
(अध्यात्मिक प्रमुख, मानव धर्म प्रचार-प्रसारक)
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