विदेहावस्था - बहुउद्देशीय परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडळ मोहाडी

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गुरुवार, १७ जून, २०२१

विदेहावस्था

विदेहावस्था

 महानत्यागी बाबा जुमदेवजीने एक भगवंत की प्राप्ति श्रावण वद्य षष्ठी दि. २५/८/१९४८ दिन बुधवार को की । तब से वे   निराकार अवस्था में ही थे । उन्हें विदेहास्थिती प्राप्त हुई थी । वे   पूर्णतः परमेश्वरमें विलिन हुये थे । बाबा की यह स्थिती देखकर   उनके परिवार के अन्य लोग चिंताग्रस्त हुये । उन्होने आपस में   विचार किया कि । इस स्थिती बाबत परमेश्वर को बिनती करके   बाबाकों मुक्त कराये तद्नुसार वे सभी लोग एक भगवत् प्राप्ति के   दुसरे दिन बाबा के यहाँ आये तब बाबा निराकार अवस्था में ही थे   और परमेश्वर में विलीन हुये थे ।

            परिवार के लोगों ने बाबां से बिनती की कि, "हे भगवान   सेवक की यह स्थिती कब तक रहेगी?" आप सेवक को इस स्थिती   से मुक्त किजीए" तब परमेश्वर रूपी बाबाने उत्तर दिया कि, अगर   "आपका भाई अपको इतना प्यारा था, आपको इतनी हमदर्दी थी तो   आपने उसे भगवान की सेवा करने क्यों लगाई ? उस समय आपने   उन्हे रोकना था । अब सेवक भगवान का हो गया, न कि किसी का   रहा और भगवान सेवक का हो गया है । मेरा सर सेवक का धड   और सेवक का सर मेरा धड ऐसा विलीन हो गया है। इस तरह   दोनों की आत्मा एक हो गई है।"

            भगवंतने बाबांके मुखकमल से पुनः घर के लोगों को   संबोधित शब्द निकाले कि, “सेवक भगवान बन गया । इसलिए   सेवक एक ही समय थोडासा साधा भोजन करेंगे । जिसमें दाल,   चावल, सब्जी, और घी होगा । और कोई भी महीला घर की हो या   बाहर की, उसकी छाँव सेवक पर न पडे । नही तो सेवक कहीं का   नही रहेगा । जिंदा नही रहेगा ।" इस प्रकार भगवंतने सेवक को   (बाबाकों) दैवी शक्ती की जागृती दी, जिसे आज समाज में बहुत से   लोग मानते है ।

            इसी दिन से बाबां की ज्येष्ठ भाभी श्रीमती सीताबाई इनके   शरीर में शनिवार को जो पार्वती आती थी । वह उनके शरीर में आने   की क्रिया बंद हुई । बाबाकें परिवार में परमेश्वर की (हनुमानजी)   प्राप्ती करने के बाद भी जो दुःख आते थे। वह भी इसी दिन से नष्ट   हुये। बाबां के परिवार में जो अनेक दैवत माने जाते थे, वह मानना   बंद हुआ । इसके अलावा उनके घर की समस्त भुतबाधाएँ भी नष्ट हुई |

            परमेश्वर प्राप्ती से पहले बाबा के परिवार में घर के लोग   परंपरानुसार अंधश्रध्दा के कारण कुछ त्योहार नही मानते थे । उनमें   से पोला यह एक त्यौहार था। बाबांने एक भगवंत की प्राप्ती करने   के बाद जल्दी ही आठ दिनमें पोला त्यौहार आया । उन दो दिन   पहले बाबा निराकार में आये और घर के लोगों को उस निराकार   बैठक में आदेश दिया कि । इस वर्ष पोला यह त्यौहार घर के सब   लोगों ने मनाना चाहिए, तद्नुसार पोला मनाने का सुनिश्चित किया ।

            श्रावण अमावस्या आयी, पोले का दिन निकला उस दिन   सबेरेही बाबां के मकान के दरवाजे में एक बड़ा अजगर वलय   (कुंडली) बनाकर दरवाजे की आड में छुप कर बैठा था । वह किसी   भी आने वालों कों दिखता नही था । परंतु वह किसी को भी काटने   का प्रयास भी नही करता था । वह साप किसी को भी नही दिखा।   परंतु बाबा दरवाजे में जाने पर उनका ध्यान उस ओर गया । वह   सिर उपर निकालकर शांत था । कोई भी हलचल नही करता था,   यह बाबांने देखा । इस समय भी बाबा विदेह स्थिती में ही थे ।   तत्पश्चात बाबांने स्वयं ही एक छोटी सी लकडी से उसके सिरपर   मारा । उस सादे मार से ही साप मर गया । इतना बड़ा अजगर   और कुछ भी हलचल न करते हुए वह सादे मार से मरता है यह   देखकर बाबा आश्चर्य चकित हुए । उन्होने बहुत विचार किया तब   वे बोले ? इतने लंबे समय से इस घर में जो दुःख थे । उसका   असली जिम्मेदार यह साप था कोई भी मरने के पश्चात् उसे मोक्ष   प्राप्त नही हुआ, इस कारण वह साप के रूप में भूत था एक परमेश्वर   की प्राप्ति के बाद इस घर में चौबीस घंटे जागृत रहनेवाली शक्ती      चैतन्य रूप में विचरण कर रही है । इसलिए वह यहाँ रह नही पाया   और उस शक्ती के हाथों उसे मोक्ष चाहिए था । तद्नुसार उसे   परमेश्वर रूपी बाबाकें हाथो मोक्ष प्राप्त हुआ तब से आजतक उनके   घर में किसी को भी भूतबाधा नही हुई बाबा आज जिस घर में   वास्तव्य कर रहे है उस घर में चारों और से प्रसन्नता है । वहाँ   उल्हासमय वातावरण है; क्योंकि वहाँ चोबीसो घंटे जागृत शक्ती   चैतन्य रूप में विचरित है । तब से उनके घर में सुख शांति प्राप्त है। 

            कोई भी त्यौहार न माने, किसी भी देव को न माने, एकही   परमेश्वर की आराधना करे, यह यदि निश्चित हुआ था । तो भी   विधि लिखित कुछ होना है । इस कथ्य अनुसार परमेश्वर को कुछ   तो भी घटित करना था इसलिए उन्होने पोला त्यौहार के निमित्त   कर उस घर से संकट का मूल हमेशा के लिए नष्ट किया ।  

             बाबा विदेह अवस्थामें होने पर रात दिन विश्व में बृहद   विशाल एक ही नेत्र (आँख) दिखता था । इसलिये वे बहुत घबराये   थे । उस एक ही आँख को देखने की उन्हें हिंमत नही होती थी।   इसलिए उन्होंने उनके ज्येष्ठ बंधू श्री बाळकृष्ण इन्हें बताया कि   "भैय्या, मै तेरे घर आकर तेरे पास सोऊँगा । मुझे इस घर पर   विशाल एक ही आँख दिखाई देती है। वह देखकर मुझे डर लगता   है। इसलिये वह मैं देख नही सकता ।" इतना विशाल एकही नेत्र   बाबाको  एक-सव्वा महिने तक लगातार दिख रहा था ।

            बाबाने अपने ज्येष्ठ बंधु को बताये अनुसार वे उनके यहाँ   जाकर सोने लगे । श्री बाळकृष्णाजी का मकान बाबां के सामने ही   है । बाबां वहाँ भी नींद से जाग जाते थे । और उन्हें बाबा   हनुमानजी की बहुत बड़ी आकृती दिखती थी। तब बाबा भाई को   नींद से उठाते और बताते कि, "तुम बाबा हनुमानजी को बताओं कि   तूम मेरे भाई के पीछे मत पडो आप मंदिर में जाकर रहो तद्नुसार   बाळकृष्णजी, उतनी रात को ही हाथपाँव धोकर भगवंत के नाम से   कपूर लगाते और बिनती करते थे कि, "हे भगवान मैं आपसे बिनती   करता हूँ कि आप मेरे भाई के पीछे मत पडो । उसका परिवार है,   उसका प्रपंच (संसार) है । इसलिए उसे आजाद करे।" ऐसी बिनती   कर फिर सो जाते ।

            बाबांको एक ही आँख दिखना, बाबा हनुमानजी की प्रतिमा   दिखना, इन लक्षणों से यह सिध्द होता है कि, बाबा परमेश्वरमें   विलीन हुये है । क्योंकि भगवत प्राप्ति के लिये । प्रारंभ में बाबांने   जो प्रतिज्ञा की थी कि, एक तो मरूँगा या भगवंत को प्राप्त करूँगा,   परन्तु पिछे नही हटूंगा । तद्नुसार उनकी इच्छा पूर्ण हुई थी ।   परमेश्वर को प्राप्त कर वे उसमें विलीन हुये थे।

            बाबा की यह विदेह अवस्था करीब-करीब तीन महिने थी।   इस विदेह अवस्था में एक दिन बाबांने अपने परिवारजनों को   निराकार बैठक में मार्गदर्शन किया कि “घरवालो सुनो, आप सब   लोग तीन माहतक भगवान से बिनती करो कि हमारे भाई की यह   अवस्था समाप्त कर उसे गृहस्थी में रखें ।" उसके अनुसार घर के   सभी लोगों ने रोज सबेरे सुर्योदय के पूर्व तीन माह तक एक भगवंत   के नाम से अगरबत्ती व कपूर लगाकर उपरोक्तानुसार बिनती की ।   तीन माह पूर्ण होने पर दुसरे दिन हवन कर उसकी समाप्ती की और   तत्पश्चात उसी दिन बाबा होशोहवास में आये । उनकी विदेह   अवस्था समाप्त हुई । उन्हे सर्वसाधारण गृहस्थ जैसा सभी समझने   लगे और इसी के साथ उनका अज्ञातवास भी समाप्त हुआ।   वे   परमेश्वरी की (हनुमानजी) प्राप्ती करने के बाद यानि जनवरी १९४६   से करीब - करीब तीन वर्ष अज्ञातवास में थे । क्योंकि यह १९४८   साल का नवम्बर माह का दिन था । बाबा दुसरे दिन से अपने   परिवार के निर्वाह के उद्योग करने लगे । इस प्रकार बाबांके परिवार   में शांती मिली । बाबांने अपनी उम्र के अठ्ठाविसवे वर्ष एक भगवत   की प्राप्ती की । बाबां के बारें में लोगो को जैसे-जैसे, धीरे   धीरे मालूम होने लगा वैसे-वैसे लोग इस मार्ग में आने लगे सेवक   बनने लगे । इस प्रकार सद्गुरू समर्थ बाबा जुमदेवजी इस नाम से   प्रसिध्द हुये । आगे उन्हें पांच अगस्त उन्नीस सौ चौरास्सी को इस   मार्ग के सेवकोंने "महानत्यागी" यह उपाधि प्रदान कि और उन्हें   सद्गुरू समर्थ के बदले “महानत्यागी बाबा जुमदेवजी" कहने लगे ।


|| 🙏🙏नमस्कार जी 🙏🙏||


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